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Showing posts from August, 2012

आज को जिएं, खुश रहें।

कल क्या होगा? इस चिंता में लोग अक्सर अपने आज के साथ नाइंसाफ़ी कर बैठते हैं। परेशान रहने से किसी समस्या का समाधान नहीं होने वाला। आने वाला कल कैसा होगा यह बहुत कुछ हम पर निर्भर करता है। अपने आज को जिंएं, ख़ुश रहें। काम वक्त पर करने की ईमानदारी से कोशिश करें।

          इस बात का कोई महत्व नहीं है कि आप की उम्र क्या है, व्यवसाय क्या है, या आप कब से कोशिश कर रहे हैं? अगर कोई बात मायने रखती है तो यह कि आज आज की तारीख में क्या कर रहे हैं? हौंसले बुलंद रखिये क्योंकि शायद आज ही वह दिन है जब आपकी कोशीश रंग लाएगी।

          अपनी क्षमताओं का आंकलन करते समय कभी भी खुद को किसी से कम न समझें। आत्ममुग्ध होना गलत है, तो खुद को हेय समझना उससे भी ज्यादा गलत। आज जैसे भी हैं, वह बीते हुए कल के काम की बजह से हैं। कल आप कैसे होंगे, यह आज के काम पर निर्भर करेगा। तो क्यों ना कल खुद को मजबूत स्थिति में पाने की कोशिश करें।

आत्मचिंतन (स्व-मूल्यांकन ) !

हाराहुआवहनहीं, जोअपनेप्रयासमेंसफलनहींहुआ, हाराहुआव्यक्तिवहहै, जिसनेप्रयासकियाहीनहींअथवाजिसनेअपनाआत्मविश्वासखोदियाहै ! मुर्दावहनहींजोमरगयाहै, मुर्दावहहैजिसकाआत्मविश्वासमरगयाहै !
शक्तिकेविश्वासमेंहीशक्तिहै ! आत्मविश्वासकेअंकुरसेहीप्रयत्न

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती !!!

लहरों से डरकर नौका पर नहीं होती। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चढ़ती है। चढती दीवार पर सौ बार फिसलती है।। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है। चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना नहीं अखरता है।। आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

समय का मूल्य !!!

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जिसने जाना मूल्य समय का, वह आगे बढ़ पाया है। आलस कर जो बैठ गया, वह जीवन भर पछताया है।

जन-गण-मन: राष्ट्र-गान या गुलामी का गीत

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सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।