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प्रेम एक पंछी है।

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जब हम किसी से कहते हैं: आई लव यू, तो दरअसल हम किसी बारें में बात कर रहे होते हैं? इन शब्दों के साथ हमारी कौनसी मांगें और उमीदें, कौन कौन सी अपेक्षाएं और सपने जुड़े हुए हैं ! तुम्हारे जीवन में सच्चे प्रेम की रचना कैसे हो सकती है?
          तुम जिसे प्रेम कहते हो, वह दरअसल प्रेम नही है। जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह और कुछ भी हो सकता है, पर वह प्रेम तो नहीं ही है। हो सकता है कि वह सेक्स हो। हो सकता है कि वह लालच हो। हो सकता है कि अकेलापन हो। वह निर्भरता भी हो सकता है। खुद को दूसरों का मालिक समझने की प्रवृति भी हो सकती है। वह और कुछ भी हो सकता है, पर वह प्रेम नहीं है। प्रेम दूसरों का स्वामी बनने की प्रवृति नही रखता। प्रेम का किसी अन्य से लेना देना होता ही नहीं है। वह तो तुम्हारे प्रेम की एक स्थिति है। प्रेम कोई सम्बन्ध नहीं है। हो सकता है कि कोई सम्बन्ध बन जाए, पर प्रेम अपने आप में कोई सम्बन्ध नहीं होता। सम्बन्ध हो सकता है, पर प्रेम उसमें सीमित नहीं होता। वह तो उससे कहीं अधिक है।