प्रियंका और ऋषि की अमर प्रेम कहानी - मेरी पहली कहानी।

बात उन दिनों की है जब अल्मोड़ा के पास स्थित छोटे से गाँव हरियापुर में नौजवानों और नवयुवतियों की एक नई जमात तैयार हो रही थी। प्रियंका और ऋषि भी उन्हीं में से थे। संयोग से दोनों एक दूसरे के पड़ौसी भी थे। एक दिन सुबह-सुबह जब ऋषि रोज की तरह दौड़ लगा के आ रहा था तो सामने से जाती प्रियंका से चलते-चलते पूँछा- क्या हाल चाल है प्रियंका, सब मजे में? प्रियंका ऋषि के प्रश्न को जानबूझकर अनसुना करते हुए अपने रसभरे अधरों पर मंद शरारती मुस्कान बिखेरती हुई व इठलाती हुई आगे बढ़ गयी। उसकी इसी मादक अदा के ही तो दीवाने थे हरियापुर के सभी नवयुवक। लेकिन ऋषि को प्रियंका का यूँ अनदेखा किया जाना बिलकुल अच्छा नहीं लगा।

        दोनों के परिवारों में थोड़ी आपसी कलह अलग थी। कभी-कभार हाय-हैलो भर हो जाया करती थी। वैसे भी दोनों एक ही गांव के होते हुए भी अलग-अलग कुटुंब व अलग-अलग जाति से थे। जहाँ प्रियंका उच्च कुलीन वर्ग के ब्राम्हण परिवार से थी वहीं ऋषि एक दलित समुदाय से ताल्लुक रखता था। प्रियंका के पिता गाँव के मंदिर में पुजारी व माँ पास ही के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका थी। दूसरी और ऋषि के पिता सामान्य कृषक व मजदुर थे था माँ एक सामान्य गृहणी थीं और कपड़े पर कशीदाकारी व सिलाई का काम करती थी।

         दोनों ने अभी-अभी अपनी तरुणाई की अंगड़ाई तोड़कर नवयौवन की सीढ़ियों पर कदम रखे थे। ऋषि से उम्र में एक साल बड़ी, लंबी-पूरी छरहरे बदन वाली प्रियंका की यौवन से भरपूर देह एक साँचे में ढली हुई मूरत की भाँति आकर्षक हो चली थी। यौवन की खुशबू से महकता गौर-सुनहरा बदन, लंबे-काले-घुंघराले बाल, बड़ी-बड़ी झील-सी गहरी काली आँखें, तलवार सी बोहें (EyeBrow), साँचे में ढली हुई सुन्दर नाक, बडे आकार के महँगे फैशनेबल कर्णफूलों से सुसज्जित कान, गजनार से गुलाबी अधर, यौवन से भरपूर विस्तृत सुडौल वक्ष-स्थल, गहरी नाभि, पतली कमर, भरपूर अधोभाग, लंबी उँगलियों वाले खूबसूरत हाथ और दाहिने गाल पर बना खूबसूरत डिम्पल लिए हुए पुष्प-कमल की तरह खिला हुआ व मंद मुस्कान वाला गोल चेहरा। चाहे जो ड्रेस पहनें, खबसूरत ही लगेगी। उल्टा उसके पहने जाने से खुद ख़राब कपड़े की खूबसूरती बढ़ जाये। उसकी खूबसूरती का जितना वर्णन करें, कम है। उसके सौंदर्य को देखकर हर कोई सोचने पर विवश हो जाता था कि काश मै सौंदर्य रस वाला कोई कवि क्यूँ नहीं हुआ? उसकी देह को देखकर ऐसा लगता था जैसे अगर कोई मूर्तिकार अपनी बनायी मूरत में सहस्त्रों बार भी कमियाँ ढूंढना चाहे, फिर भी कोई कमी ना निकाल पाए। कोई भी महिला अथवा पुरुष उसे देखे तो बस देखते ही रह जाये। प्रियंका को इस बात का अभिमान भी खूब था। होना भी चाहिए था, नहीं क्या?




         जहाँ तक ऋषि की बात की जाये तो वह लंबे-चौड़े डील-डौल वाला एक शरारती किस्म का, पढाई में औसत एवं स्पोर्ट्स व साहसिक गतिविधियों में गहरी रूचि रखने वाला नवयुवक था। आकर्षक होने के कारण वह भी गाँव व कॉलेज की गोपियों का प्यारा कन्हैया था। ये बात अलग है कि ऋषि और प्रियंका दोनों ही किसी को घाँस तक नहीं डालते थे, ना ही गाँव में, ना ही कॉलेज में। और हाँ, ना ही एक दूसरे को।

         दोनों ने गाँव के सीनियर सेकेंडरी स्कूल से अपनी 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी कर “अल्मोड़ा कॉलेज ऑफ़ साऊथ एशियन स्टडीज” में दाख़िला लिया था जो कि अपनी शिक्षण-व्यवस्था, सुख सुविधाओं एवं एक्स्ट्रा-करीकुलर एक्टिविटीज के लिए सुप्रसिद्ध था। दोनों ही पढाई में ठीक-ठाक थे, लेकिन अक्सर ऋषि के अंक प्रियंका की तुलना में थोड़े ज्यादा आ जाया करते थे। पड़ौसी होने के कारण दोनों में प्रतिस्पर्धा भी खूब थी। यहाँ तक कि इस प्रतिस्पर्धा के चक्कर में उनके बीच अक्सर नोंक-झोंक होती रहती थी। दोस्तों को इस तमासे से खूब आनंद मिलता था। जहाँ तक दोनों की रुचियों की बात की जाये तो संयोग से दोनों को ही बैडमिंटन खेलना, तैराकी करना एवं नई-नई जगह घूमना बेहद पसंद था। कभी-कभार आपस में दोनों का बैडमिंटन मैच होता तो प्रियंका अपने फुर्तीलेपन के कारण अक्सर ऋषि पर भारी पड़ जाया करती थी। जिससे उसका ऋषि से कम अंक पाने का गम थोड़ा हल्का हो जाया करता था। 

         स्नातक के अंतिम वर्ष में एक दिन कॉलेज की तरफ से 20 छात्रों के लिए उत्तराखंड स्थित “केदारताल ट्रैक” पर जाने के लिए नोटिस निकला। कक्षा के सभी पंजीकृत छात्रों में से लॉटरी द्वारा 10 लड़के व 10 लड़कियों का चयन हुआ। इत्तेफाक से प्रियंका और ऋषि दोनों का ही चयन हो गया था। स्पोर्ट्स में अच्छा होने के कारण ऋषि को टीम का लीडर नियुक्त किया गया। उसकी ही देखरेख में हफ्ते भर की कंडीशनिंग एवं फिजिकल ट्रेनिंग के बाद सभी ने अपने शर्दियों के कपड़ों के साथ-साथ, खानपान व अन्य जरुरी सामान ट्रैकिंग बैग में पैक कर लिया था। एक दिन के रेस्ट के बाद अगले दिन सभी टीम सदस्य पौ फटते ही सूर्य की पहली सुनहरी किरण के साथ अल्मोड़ा से बस में बैठकर ट्रैक के प्रारंभिक बिंदु गंगोत्री के लिए रवाना हो लिए। 

         बस हरिद्वार, ऋषिकेश एवं उत्तरकाशी होते हुए शाम के 8 बजते-बजते गंगोत्री पँहुच गयी। जल्दी ही सभी लोग भोजन कर पहले से ही ऑनलाइन बुक कर लिए गए होटल में जाकर सो गए। कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी। थर्मामीटर का पारा शून्य बिंदु को किस करने पर आमादा था। अगले दिन सुबह जल्दी ही ट्रैकिंग शुरू करने के ख्याल से सभी रोमांचित तो थे ही। लेकिन अभी भी सबके नेत्र-पटलों पर आज ऊँचे-ऊंचे पहाड़ों पर बनी सँकरी व खतरनाक सड़कों पर तय किये गए रास्ते व नीचे बहुत गहराई में तेज आवाज के साथ बहती गंगा नदी के विहँगम दृश्य छाये हुए थे। साथ ही रास्ते में घंटों तक टिहरी बाँध की विशाल जलराशि को घेरे हुए पहाड़ों से होते हुए निकलना और भी ज्यादा रोमांचकारी था। इस यात्रा के दौरान सभी टीम सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन व कैमरों से तस्वीर खींचने में व्यस्त थे। 

         अगली सुबह होते ही सबने चाय-नास्ता करने के बाद अपना-अपना बैग पीठ पर लादकर अपने गंतव्य के लिए पैदल ट्रैकिंग शुरू कर दी। गंगोत्री से ऊपर चढ़ते ही घने सुन्दर जंगल ने हमारा स्वागत किया। यहाँ माँ गंगे की एक अन्य लघु जल-धारा (केदारगंगा) की कल-कल की मधुर ध्वनि शांत वातावरण में मिठास घोल रही थी जो कि गौमुख से आने वाली गंगा की मूलधारा के साथ समुद्रतल से 2900 मीटर के ऊँचाई पर स्थित गंगोत्री धाम पर आकर मिल जाती है। बीच-बीच में ठन्डे व मधुर जल से सराबोर अनेक मनोहारी झरने मिलते गए। पक्षियों की मधुर चहचहाट इन दृश्यों को और भी अविश्मरणीय बना रही थी। यह सब घटित हो रहा था दोनों तरफ से लम्बी-ऊँची विशाल व तीक्ष्ण चोटियों के बीच। सभी लोग दाहिने तरफ के पहाड़ के बीचों-बीच से होकर गुजर रहे थे। कुल मिलाकर इतना मनोरम दृश्य कि पत्थर दिल इंसान में भी प्रेम का संचार हो जाये। किसी लड़की से नहीं तो प्रकृति से ही सही। सब दोस्तों को इंतज़ार था प्रियंका और ट्रैक लीडर ऋषि के पत्थर दिलों में प्रेम पनपने एवं उनके बीच मीठी नोंक-झोंक का क्योंकि दोनों के बीच स्कूल व कॉलेज में खूब तीखी नोंक-झोंक हुआ करती थी जिससे सभी साथियों को बड़ा आनंद मिलता था। अक्सर लड़कियाँ ठंड में और कई गुना आकर्षक दिखने लगती है। यही हाल प्रियंका का था। उसे देखकर लगता था जैसे उसकी खूबसूरती में चार चाँद लग गए हों।

         घंटे भर चलने के बाद ये पेड़ और जंगल पीछे छूटते चले गए और अब पूरी टीम एक सुनसान सी जगह पर पहुँच चुकी थी जहाँ चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ चट्टानों में हुए भू-स्खलन से उड़ती रेत और ऊपर से गिरते पत्थरों की आवाज सुनाई दे रही थी। अचानक से आये हवा के तेज झोंके ने प्रियंका, दीपक और पूजा को हज़ारों फुट नीचे खाई में धकेल दिया होता अगर ऋषि ने तुरंत फुर्ती दिखाकर व अपनी जान पर खेलकर उन्हें संभाला ना होता। फिर भी प्रियंका के पैर में थोड़ी चोट आ गयी थी। ट्रैक-लीडर होने के नाते ऋषि को सबकी सुरक्षा का ख्याल तो रखना ही था। उसने प्रियंका के पैर में दवा लगाते हुए पट्टी कर दी व एक दर्द निवारक गोली दे दी। लगभग एक किमी लंबी इस खतरनाक जगह को सभी ने आपस में रस्सी पकड़कर और एक दूसरे का साथ देते हुए पार कर चैन की साँस ली।

         यहाँ से आधा घंटा और चलने के बाद देखते ही देखते शाम के तीन बज चुके थे और अब सभी लोग एकदम बर्फ से ढँकी पड़ी हिमालय की गगनचुम्बी चोटियों के बीच थे। तभी अचानक से तेज हवाओं के साथ हिमपात (स्नो-फॉल) होने लगा। सभी ने एक चट्टान की ओट में थोड़ी जगह ढूंढकर अपने-अपने टैंट गाढ़ दिए। हरेक टैंट में दो-दो लोग थे। शाम होते-होते हिमपात रुक चुका था।

         शाम को जब सब टैंट में घुसे हुए थे तभी प्रियंका के टैंट से उसकी दोस्त पिंकी ने जानबूझकर प्रियंका का नाम लेकर ऋषि को आवाज देते हुए बोली- “अरे ऋषि, प्रियंका तुमसे चाय बनाने के लिए बोल रही है यार”। ऋषि ने तपाक से मना करते हुए जबाब दिया कि उसी से बोल दे, वही बना लेगी और हाँ मेरे लिए भी। तभी ऋषि के टैंट से उसका दोस्त बिज्जू व अन्य टैंटों से नंदिनी व खुद प्रियंका बाहर निकलकर आये और सबके लिए चाय व मैगी बना दी। प्रियंका ने ऋषि के आलावा सबको आवाज देकर चाय पीने बुला लिया। ऋषि खुद ही बाहर आकर चाय का पहला घूंट लेते ही बोला- "वाह ! क्या बेहतरीन चाय है! किसने बनायीं है?" अपनी बनायी हुई चाय की ऋषि के मुख से प्रसंशा सुनकर शरारती प्रियंका मंद-मंद मुस्काई। तभी पिंकी ने बताया कि चाय तो प्रियंका ने बनायी है। ये सुनकर ऋषि जानबूझकर अपनी नाक सिकोड़ते हुए बोला- "हाँ हाँ ठीक है, ठीक है, इत्ती भी बढ़िया नहीं है।" लेकिन प्रियंका मन ही मन जानती थी कि ऋषि को उसकी बनायी हुई चाय खासी पसंद आयी है। जब प्रियंका चाय पीकर टैंट में चली गयी तो पिंकी से धीरे से ऋषि ने पूँछा- "यार थोड़ी चाय और मिलेगी क्या?" पिंकी इठलाते हुए प्रियंका को आवाज लगाकर बोली-  "ऋषि और चाय माँग रहा है, दे दूँ क्या?" प्रियंका हंसते हुए व ऋषि को छेड़ने के अंदाज में बोली- "रहने दे यार, पता नहीं अपनी बुरी चाय से कहीं किसी के पेट में दर्द हो गया तो हमें आगे बचाएगा कौन? हम ही पी लेंगे।" "अरे यार पिंकी दे न चुपचाप" कहते हुए ऋषि ने पिंकी के हाथ से बची हुई पूरी चाय छीनकर पी ली। प्रियंका के कान तो ऋषि की आवाज पर ही लगे थे। यह सब सुनकर उसका पत्थर दिल ऋषि के लिए पिघलने लगा। क्योंकि वह यह मान चुकी थी कि आज अगर ऋषि ने अपनी जान की परवाह किये बगैर एन मौके पर मुझे नहीं संभाला होता तो पक्का मेरी जान चली गयी होती। वह खुद की ज़िन्दगी को अब ऋषि का दिया हुआ सबसे बेशकीमती तौहफा समझने लगी थी। वह रातभर ऋषि के बारे में ही सोचती रही एवं तरह-तरह के खूबसूरत ख़यालों में खोयी रही। पिंकी को भी उन दोनों को छेड़ने में बडा मजा आ रहा था। वह दोनों की अच्छी दोस्त होने के कारण उन दोनों में आपस में कैसे भी करके दोस्ती करवाना चाहती थी। वह ऋषि को अपने दोस्त से ज्यादा अपने भाई की तरह मानती थी और ऋषि भी उसे अपनी बहन की तरह। क्योंकि ऋषि ने ही फर्स्ट इयर में पिंकी के कहने पर अपने दोस्त बिज्जू से उसकी सेटिंग करायी थी। उधर बाकी लोग आज आये भीषण कठिनाई भरे रास्तों और अगले दिन आने वाले संभावित व और अधिक दुर्गम रास्तों के ख्यालों से भयभीत थे।

         अगले दिन सुबह-सुबह जब ऋषि जगा तो उसने देखा प्रियंका थोड़ी दूर एक चट्टान के पास बैठी-बैठी उगते हुए सूरज को निहार रही थी। ऋषि उसके पैर के हालचाल पूँछने व पैर की पुनः पट्टी करने उसके पास चला गया था। उसने देखा कि प्रियंका एकदम मग्न होकर पेंटिंग बना रही थी जिसमें पिछले दिन हुए हादसे का स्कैच उकेरा गया था जिसमें ऋषि को पूजा व दीपक के साथ-साथ खुद को भी बचाते हुए एक हीरो की शक़्ल में हाईलाइट किया गया था। ऋषि उसकी दशा भाँप गया था कि वह कल के हादसे के बाद उसे चाहने लगी है। इसलिए ऋषि ने थोड़ा नरम पड़ते हुए बोला - थैंक्स प्रियंका, शाम को बडी अच्छी चाय बनायी थी तुमने। प्रियंका ने बिना कुछ बोले ख़ुशी से अपने अधरों पर एक मंद दबी से मुस्कान बिखेर दी। आगे जैसे ही ऋषि ने पूँछा- अब कैसा है तुम्हारा पैर? प्रियंका बिन बोले शरमाते हुए टैंट के तरफ मुड़ी तो उसने देखा की चट्टान के ऊपर खड़ा जंगली भेड़िया ऋषि पर हमला करने ही वाला है। उसने आव देखा ना ताव, झपटकर तेजी से ऋषि की तरफ वापस मुड़ी और उसे तेज धक्के से एक तरफ गिरा दिया। जैसे ही भेड़िया मुड़कर ऋषि पर दुबारा झपटा, प्रियंका ने फुर्ती से खड़े होकर ऋषि की तरफ लपकते भेड़िये से बिलकुल भी डरे बिना अपने बालों में लगी पेन्सिलनुमा धातु की रौड़ निकालकर भेड़िये के सर में घुसा दी। दर्द से तिलमिलाता भेड़िया बगल में नीचे गहरी खाई में जा गिरा। इस दौरान भेड़िये के पंजे की जरा-सी खरोंच प्रियंका के हाथों पर आ गयी थी। पहले से चोटिल पैर और जख्मी हो गया था लेकिन उसे इस बात का संतोष था कि उसने आज उस व्यक्ति की जान बचाई है जिसने कल ही उसकी जान बचाई थी। उस ऋषि की जान, जिसे कल तक वह बिलकुल भी पसंद नहीं करती थी।

         जैसे ही वह खड़ी होने लगी तो उसने देखा की वह ऋषि की बाँहों में पड़ी हुई है। ऋषि ने उसे सहारा देकर खड़ा किया, उसे थैंक्स बोला और अपने सीने से लगाते हुए उसका ललाट चूम लिया। प्रियंका ने भी ऋषि को भींचकर अपनी बाँहों में जकड़ लिया। कुछ देर तक दोनों भावुक होकर यूँही खड़े रहे और फिर एक-दूसरे की तरफ देखते हुए मुस्कुराये। अब तक सब लोग अपने टैंट से बाहर आ चुके थे। यह दृश्य देखकर सब बहुत खुश थे। टैंट में ले जाकर ऋषि ने उसकी पुरानी पट्टी खोलकर नयी मरहम पट्टी की और इंजेक्शन लगाया। अब दोनों की ज़िन्दगी एक दूसरे की गुलाम हो चुकी थी।

         अगले दिन भी इसी तरह यात्रा जारी रही। प्रियंका को सभी लोग बारी-बारी से अपना सहारा देते रहे। दोपहर 2 बजे, बीच पहाड़ में बर्फ पर बने सँकरे रास्ते से गुजरते वक्त अचानक से भयंकर बर्फीले तूफ़ान ने घेर लिया। इस स्थिति में नीचे वापस लौटने में वर्फ़ से फिसलकर नीचे गिरने का भारी खतरा था। तेज बर्फीली हवाओं की बजह से आगे बढ़ना भी मुश्किल था। आगे बढ़ने की कोशिश करने पर तेज हवा वापस नीचे की तरफ धकेल देती। इसलिए जब काफी देर तक तूफ़ान चलता रहा और इसके जल्द ख़त्म होने के संकेत नहीं दिखे तो ट्रैक-लीडर ऋषि ने सबसे सलाह मशविरा कर तय किया कि हम नीचे वापस उतरने अथवा ऊपर जाने के बजाय अपनी-अपनी आइस-एक्स बर्फ में गाढ़कर वहीं वर्फ से ढँकी चट्टानों से चिपककर बैठ जाएँ। उसने कहा कि ध्यान रहे किसी को भी इस दौरान नींद नहीं आनी चाहिए वरना जान से जायेगा। सब लगातार एक दूसरे को आवाज देते रहे। तेज हवाओं की बजह से एक दूसरे की आवाज सही से सुनाई भी नहीं दे रही थी। अगला एक घंटा, एक साल की तरह निकला। सब तूफान रुकने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।

         प्रियंका का पैर जख्मी होने के कारण वह ऋषि के ही साथ थी। तेज ठंडी हवाओं से उसका पैर सुन्न पड़ने लगा था। बाकि लोगों के लिए भी अब ठण्ड सहना मुश्किल से असंभव होता जा रहा था। जबकि तूफान के रुकने के कोई संकेत नहीं थे, ऊपर से दिन ढलता जा रहा था। इसी तरह चिपके-चिपके पूरी रात यहीं ना काटनी पड़ जाये, इस डर के चलते ऋषि ने सभी टीम मेंबर्स से सलाह कर तूफ़ान के बीच में ही आगे बढ़ने का फैसला लिया। लगभग आधा घंटे तक एक-एक कदम सावधानीपूर्वक रखते हुए ऊपर की ओर आगे बढ़ते रहे। तभी जाकर पंक्ति में सबसे आगे चल रहे बिज्जू ने सभी को आवाज देते हुए ख़ुशी जाहिर की। एक उम्मीद की किरण दिखी। आगे जाकर देखा तो 15-20 मिनट की दूरी पर एक चट्टान की ओट में एक खुली जगह थी। जैसे ही सभी लोग टैंट गाढ़ने लगे वैसे ही तीन टैंट तूफ़ान की तेज हवा उडा ले गयी। टैंट्स के उड़ने के साथ ही संयोगवश तूफ़ान भी धीमा पड़ चला था। ये रात बहुत ही ज्यादा सर्द रात थी। शाम को तेज हिमपात और बर्फीले तूफान ने आवोहवा को बहुत ज्यादा सर्द कर दिया था। इतना ठंडा कि यदि स्टोव पर पीने के लिए गरम किये गए पानी को 2 मिनट प्लास्टिक की बोतल में टैंट के बहार रख दो तो चंद मिनटों में पूरी तरह ठोस बर्फ बन जायेगा। उस रात तापमान माइनस 15 डिग्री सेल्सियस को छू गया था। तीन टैंट्स उड़ जाने के कारण बाकि बचे टैंट्स में ही सबको एडजस्ट करना था। सभी ने विचार विमर्श कर प्रियंका को ऋषि और बिज्जू के साथ सोने के लिए बोल दिया क्योंकि ऋषि को प्रियंका के जख्मी पैर का ख्याल भी रखना था। मेडिकल किट भी उसी के पास थी। थोड़ा ना-नुकुर के बाद प्रियंका उनके साथ सोने के लिए मान गयी। जब ऋषि प्रियंका के पैर की नयी पट्टी कर रहा था तो तेज दर्द के कारण वह ऋषि से चिपक गयी व उसे अपनी मदमस्त वाहों में जकड़ लिया और उससे लिपटकर सो गयी। आज की रात उसकी ज़िन्दगी की सबसे ज्यादा सुकूनभरी रात थी। ऋषि भी उसे चाहने लगा था। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया था। दोनों एक दूसरे के ऋणी जो हो गए थे। सुबह उठकर बिज्जू ने दोनों को जगाते हुए कहा- अब तो जग जाओ भई, सोते ही रहोगे? आगे नहीं जाना है क्या? सब जग गए हैं। चलो जल्दी उठकर तैयार हो जाओ।

          प्रियंका के घायल पैर की बजह से ऋषि उसे सहारा देते हुए आगे ले जाने के लिए तैयार था। सभी ने आपस में  विचार-विमर्श कर रोहित को टैंट में छोड़कर जाने का निर्णय लिया क्योंकि उसे ज्वर महशूस हो रहा था और साथ ही उसके लिए हिमालय में इतनी ऊँचाई पर वनस्पति के अभाव के कारण साँस लेना भी मुश्किल होता जा रहा था। हर तरफ बर्फ ही बर्फ थी। आर्द्रता की बजह से हवा बहुत भारी हो चली थी। उसकी देखभाल के लिए उसकी कजिन मनोरमा ने भी वहीं ठहरने का फैसला किया।

         आज की चढ़ाई बहुत ही मुश्किल भरी थी और वो भी तेज ठंडी हवाओं के बीच, पूरी तरह बर्फ के ग्लेशियर पर चलकर। जूतों में बिना क्रेम्पोन पहने एक कदम बढ़ाना भी जोखिमभरा था। आज के दिन 3 घंटे में 3 किमी की दूरी और 1000 मीटर की लगभग सीधी चढ़ाई तय करनी थी। आखिर सब लोग 11 बजते-बजते अपने गंतव्य केदारताल पहुंचे। पूरी तरह बर्फ से ढके थलयसागर (6100  मीटर) और भृगु-पंथ (5800 मीटर) की पदस्थली में समुद्रतल से 4975 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एकदम ताजा निर्मल जल से भरे केदारताल को देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो अपने दांतों तले ऊँगली दबाने को मजबूर हो गए। सब सोचने लगे प्रकृति की भी क्या लीला है? बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों के बीच पानी से भरा ताल वो भी कमरे के तापमान वाले स्वादिष्ट दिव्य जल से भरा हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे जीते जी स्वर्ग में आ गए हों।

         प्रियंका इस स्वर्ग जैसी जगह पर इतने खूबसूरत अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी। ऋषि को हमेशा के लिए अपना बना लेना चाहती थी। अचानक से उसने फोटो खिंचवाने में व्यस्त ऋषि को आवाज देते हुए अपने पास बुलाया। सब उन्हीं की तरफ देखने लगे। देखते ही देखते उसनेे अपनी वाहें फैलाते हुए ऋषि को हमेशा के लिए उसका हो जाने के लिए प्रपोज़ कर दिया। 

         “ऋषि, मेरे लिए ये दिव्य खूबसूरत जगह स्वर्ग के समान है और तुम इस स्वर्ग के देवता के समान। अब तो मेरी हर साँस पर इसी देवता का राज है। मुझे मेरी ज़िन्दगी की हर ख़ुशी मिल जाएगी अगर तुम मेरी साँसों को अपनी साँसों में पनाह दे दो।”

          ऋषि कुछ क्षण ख़ुशी से आह्लादित हो विश्मय से उसे निहारता रहा और फिर सहस्त्रबाहु की तरह अपनी बाहें फैला दी। प्रियंका दौड़ते हुए उसकी बाँहों में जा समायी। उसे आज ज़िन्दगी की हर ख़ुशी मिल गयी थी। उसे एक ऐसा साथी मिल गया था जो दुश्मन के लिए भी अपनी जान लड़ा दे। ऋषि की आँखें भी ख़ुशी से छलक आयीं। सभी दोस्त इस ख़ुशी में उनके भागीदार बने। प्रतिभाशाली फोटोग्राफर और ऋषि का सबसे करीबी दोस्त बिज्जू ऐसे बेशक़ीमती लम्हों को कैसे जाने देता। उसने यह अविस्मरणीय पल अपने कैमरे में भाँति-भाँति कैद कर लिया। लगे हाथ पिंकी ने भी बिज्जू को प्रपोज कर दिया। वह भी भला मौके को क्यूँ हाथ से जाने देती। बिज्जू और पिंकी का भी घर बसता हुआ देखकर सब बहुत खुश थे। इस लम्हें को कैमरे में कैद किया प्रियंका ने। वो भी कमाल की फ़ोटोग्राफर थी।

          लेकिन अब यहाँ तेज बर्फीली हवाओं के बीच और 2 मिनट भी रुकना असंभव था। सभी फटाफट ग्रुप फोटो और व्यक्तिगत फोटो खींचकर 15 मिनट के अंदर वहाँ से निकल लिए और 3 बजते-बजते टैंट में बापस पहुँचते ही रोहित और मनोरमा को सही सलामत पाकर चैन की साँस ली। रोहित का ज्वर भी शांत हो चला था। रात को यहीं टैंट में ठहरकर अगले दिन शाम 5 बजे तक सब लोग गंगोत्री पहुँच गए थे। वहाँ पहुँचकर सभी ने गीजर के गरम पानी से स्नान कर अपनी थकान दूर की और 6 बजे ऐतिहासिक गंगा मंदिर में आरती और पूजा का आनंद लिया और अपनी सलामती के लिए भगवान, माँ गंगे व पर्वतराज हिमालय का शुक्रिया अदा किया। सभी ने घर ले जाने के लिए एक-एक बोतल में यहाँ का निर्मल और पावन गंगाजल भरकर होटल पहुंचे।

        खाना खाने के बाद सभी ने एक साथ गंगोत्री के छोटे से बाजार में खरीददारी का आनंद लिया। ऋषि ने प्रियंका के लिए एक गुलाबी रंग का दुपट्टा और प्रियंका की पसंद की ही आसमानीे रंग की एक बेहतरीन ड्रैस खरीदी। वहीं प्रियंका ने भी ऋषि के लिए एक बहुत ही अच्छा बैडमिंटन रैकेट, ऋषि की माँ के लिए हाथों से बनी एक बेहतरीन बनारसी साड़ी व ऋषि की छोटी बहन कल्पना के लिए एक शानदार ब्रांडेड हथ-घड़ी खरीदी। सभी ने गंगोत्री के ही एक होटल में आज की रात सुकून के साथ ट्रैक के खूबसूरत लम्हों और दृश्यों को याद करते हुए गुजारी। प्रियंका, ऋषि के साथ ही सोयी। ये रात्रि उनके लिए सुनहरे मिलन और समागम की प्रथम रात्रि थी।

         घर पहुँचे तो दोनों के प्यार के किस्से हर किसी की जुबान पर थे। उड़ती-उड़ती ये बातें दोनों के घर वालों तक भी पहुँची। घरवालों को शादी के लिए राजी करते वक्त शुरू-शुरू में दोनों तरफ से समस्या हुई। लेकिन प्रियंका का बड़ा भाई थोड़ा खुले विचारों का होने के कारण अपनी बहन की ख़ुशी के लिए अपने माता-पिता को राजी करने में सफल रहा तो यही कमाल प्रियंका के दिए गिफ्ट ने कर दिखाया। ऋषि की माँ तो खूबसूरत बनारसी साड़ी पाकर ख़ुशी से गदगद हो गयी जबकि ऋषि की छोटी बहन को प्रियंका की दी गयी हथ-घड़ी इतनी पसंद आयी कि अपने पिता को राजी करके हथ-घड़ी गिफ्ट करने वाली को घर में भाभी बनाकर लाने की ठान ली और अंत में सफल भी हुई।

        आश्चर्य होता है कि कैसे कोई छोटा सा गिफ्ट वह कमाल कर जाता है जो खुद गिफ्ट देने वाले नहीं कर पाते। देखते ही देखते दोनों परिवारों की दुश्मनी कब गहरी दोस्ती में बदल गयी, पता ही नहीं चला। दोनों परिवारों ने तय किया कि पढ़ाई पूरी होने एवं जॉब लगने के बाद दोनों की सगाई व शादी कर दी जायेगी।

         अल्मोड़ा से स्नातक व देहरादून से मास्टर्स करने के बाद दोनों को दिल्ली के “जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (J.N.U.) से Ph.D. करने का मौका मिला। इस दौरान प्रियंका ने स्विमिंग में जबकि ऋषि ने बैडमिंटन में नेशनल गेम्स में पदक भी जीते। तत्पश्चात प्रियंका को चीन की राजधानी बीजिंग में भारतीय दूतावास में दक्षिण एशिया मामलों की विशेषज्ञ के तौर पर मोटी तनख्वा वाली जॉब मिल गयी, जबकि ऋषि बीजिंग यूनिवर्सिटी में साउथ एशियन स्टडीज विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर चयनित हो गया। अब तक प्रियंका 28 की जबकि ऋषि 27 का हो चूका था। इस उम्र को शादी के लिए सबसे उपयुक्त समय मानते हुए दोनों ने शादी करने का फैंसला किया। दोनों ने अपने पैतृक गांव में ही धूमधाम से पहले सगाई और फिर शादी कर ली। आज प्रियंका अपने जैसी ही एक खूबसूरत प्यारी बेटी की माँ है और अपने पति ऋषि के साथ बहुत खुश है। कभी-कभी भारत आते हैं तो हिमालय की बादियों में घूमने जरूर जाते हैं ताकि अपनी उस रोमांचित कर देने वाली यात्रा को महशूश कर सकें।                                                     

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